27 अप्रैल 2026
सीजी क्राइम रिपोर्टर
न्यायधानी बिलासपुर
बिलासपुर। शिक्षा विभाग में पदोन्नति संशोधन के नाम पर एक बड़ा खेल सामने आया है। आरोप है कि हाईकोर्ट और लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) के स्पष्ट निर्देशों को दरकिनार करते हुए गुपचुप तरीके से शिक्षकों को प्रधान पाठक पद पर पदस्थापित कर दिया गया। इस पूरे मामले की शिकायत कांग्रेस नेता अंकित गौरहा ने दस्तावेजों के साथ कलेक्टर और कमिश्नर से की है।
बताया जा रहा है कि 27 दिसंबर 2024 को तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी टी.आर. साहू द्वारा सहायक शिक्षकों को प्रधान पाठक पद पर पदोन्नति दी गई थी, जो 29 मार्च 2023 के विभागीय दिशा-निर्देशों के अनुरूप थी। लेकिन इसके बाद कुछ शिक्षकों ने पदस्थापना को लेकर आपत्ति जताई और मामला न्यायालय तक पहुंच गया।
16 अप्रैल 2025 को हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को DPI के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद 4 सितंबर 2025 को DPI ने अभ्यावेदन को अमान्य कर पूर्व आदेश के अनुसार पदस्थापना करने के निर्देश दिए। यहीं से पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया।
आरोप है कि जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे और बाबू सुनील यादव ने इन आदेशों की अनदेखी करते हुए शिक्षकों को मनचाहे स्थानों पर पोस्टिंग दे दी। उदाहरण के तौर पर हलधर साहू, शिप्रा बघेल और सूरज कुमार सोनी सहित कई शिक्षकों की पदस्थापना नियमों के विपरीत बदल दी गई और उन्हें शहरी या सुविधाजनक स्थानों पर भेजा गया।
शिकायत में यह भी सामने आया है कि कोटा विकासखंड से इस कथित गड़बड़ी का दूसरा दौर शुरू हुआ, जहां संशोधित आदेश जारी कर अन्य शिक्षकों को भी इसी पैटर्न पर पदस्थापित किया गया। जबकि 2024 के आदेश में स्पष्ट था कि 10 दिनों के भीतर कार्यभार ग्रहण नहीं करने पर पदस्थापना स्वतः निरस्त मानी जाएगी।
मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि करीब तीन साल बाद वेटिंग लिस्ट में शामिल शिक्षकों को भी नियमों के विरुद्ध पदोन्नत कर दिया गया। इसके लिए नई डीपीसी कमेटी गठित कर टकेश्वर जगत, आस्था गौरहा, फुलेश सिंह, हेमलता पटेल और ईश्वरी ध्रुव को प्रधान पाठक बनाकर शहर के स्कूलों में पदस्थापना दे दी गई।
इधर, अवमानना के डर का हवाला भी दिया जा रहा है, लेकिन शिकायत के अनुसार DPI द्वारा अभ्यावेदन निरस्त किए जाने के बाद न्यायालय के आदेश का पालन हो चुका था। इसके बावजूद कथित रूप से पूरी प्रक्रिया को मोड़ दिया गया।
कांग्रेस नेता अंकित गौरहा ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह शिक्षा विभाग में बड़े पैमाने पर नियमों की अनदेखी और लेन-देन का मामला हो सकता है।
अब देखना होगा कि प्रशासन इस गंभीर शिकायत पर क्या कदम उठाता है और क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई सख्त कार्रवाई होती है।
