जेल से रिहाई तय, लेकिन छत्तीसगढ़ की सरहदों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त पाबंदी
04 फरवरी 2026
सीजी क्राइम रिपोर्टर
राजधानी रायपुर
छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाला मामले में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच के दायरे में चल रहे इस प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा को अंतरिम जमानत दे दी है। हालांकि राहत के साथ अदालत ने कड़ी शर्तें भी लगाई हैं, जिनके चलते लखमा को फिलहाल छत्तीसगढ़ में रहने की अनुमति नहीं होगी।
सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ का आदेश
सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची की खंडपीठ ने लखमा की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें अंतरिम जमानत प्रदान की। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राहत पूरी तरह शर्तों के अधीन होगी।

जमानत की प्रमुख शर्तें
👉 राज्य से बाहर रहना अनिवार्य – जमानत अवधि के दौरान कवासी लखमा छत्तीसगढ़ राज्य की सीमा से बाहर रहेंगे।
👉विधानसभा सत्र के लिए सीमित प्रवेश – वे केवल विधानसभा सत्र प्रारंभ होने से एक दिन पूर्व राज्य में प्रवेश कर सकेंगे।
👉सत्र समाप्ति के तुरंत बाद प्रस्थान – सत्र खत्म होते ही उन्हें पुनः राज्य से बाहर जाना होगा।
इन शर्तों के साथ अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।
कब और क्यों हुई थी गिरफ्तारी
प्रवर्तन निदेशालय ने 15 जनवरी 2025 को शराब घोटाला मामले में कवासी लखमा को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद उन्हें 7 दिनों की ईडी रिमांड पर रखा गया, फिर 21 जनवरी से 4 फरवरी तक न्यायिक रिमांड पर भेजा गया। तब से वे रायपुर केंद्रीय जेल में बंद थे।
ईडी का क्या है आरोप
ईडी के अनुसार, छत्तीसगढ़ में तत्कालीन भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल में शराब नीति में बदलाव कर एक संगठित सिंडिकेट के जरिए करीब 2,000 करोड़ रुपये से अधिक का घोटाला किया गया।
इस कथित सिंडिकेट में IAS अधिकारी अनिल टुटेजा, आबकारी विभाग के एमडी एपी त्रिपाठी और कारोबारी अनवर ढेबर शामिल बताए गए हैं।
ईडी का दावा है कि इस अवैध कमाई में से लगभग 70 करोड़ रुपये सीधे कवासी लखमा तक पहुँचे। एजेंसी के मुताबिक, लखमा सिंडिकेट के अहम हिस्सेदार थे और उनके निर्देश पर ही पूरा नेटवर्क काम करता था।
नीति बदलाव और FL-10 लाइसेंस पर सवाल
ईडी ने यह भी आरोप लगाया है कि कवासी लखमा के इशारे पर ही छत्तीसगढ़ में FL-10 लाइसेंस प्रणाली शुरू की गई, जिससे शराब सिंडिकेट को फायदा मिला।
जांच के दौरान लखमा ने खुद को अशिक्षित बताते हुए विभागीय गड़बड़ियों की जिम्मेदारी अधिकारियों पर डाली, हालांकि पैसों के लेनदेन से पूरी तरह इनकार नहीं कर पाए—ऐसा ईडी का कहना है।
राजनीतिक दृष्टि से अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश कवासी लखमा के लिए राजनीतिक रूप से अहम राहत माना जा रहा है। जमानत मिलने से वे विधानसभा की कार्यवाही में भाग ले सकेंगे, हालांकि राज्य में रहने पर लगी पाबंदी उनके सार्वजनिक और राजनीतिक गतिविधियों को सीमित रखेगी।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आगे की सुनवाई में अदालत और जांच एजेंसियां किस दिशा में कदम बढ़ाती हैं।
