बिलासपुर। पिता का छह साल की उम्र में निधन होने के बाद मां ने मजदूरी कर परिवार संभाला और बच्चों की पढ़ाई जारी रखी। डॉ. नरेश तिवारी ने भी बाल अवस्था से मजदूरी करते हुए पढ़ाई जारी रखी और कक्षा छठवीं से पीएचडी तक शासन की छात्रवृत्ति के सहारे शिक्षा पूरी की। यह संघर्ष की कहानी उन्होंने बिलासपुर प्रेस क्लब के कार्यक्रम ‘हमर पहुना’ में पत्रकारों से साझा की। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यक्ति की परिस्थितियां बदलने का सबसे बड़ा माध्यम है।

डॉ. तिवारी ने रिमोट सेंसिंग में पीएचडी के बाद मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद में वैज्ञानिक के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने बिलासपुर जिले के गांव-गांव की भौगोलिक संरचना, कोरबा में खनन के पर्यावरणीय प्रभाव तथा जबलपुर और बस्तर में खनिज अन्वेषण से जुड़े कार्य किए। वर्ष 2008 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में कदम रखा और विभिन्न संस्थानों में जिम्मेदारियां निभाने के साथ कई विश्वविद्यालयों की स्थापना में सलाहकार के रूप में योगदान दिया।

महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी के कुलपति के रूप में करीब छह माह में 13 संस्थाओं के साथ एमओयू, यूके में दो पेटेंट और शिक्षकों के 30 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित होने की जानकारी उन्होंने दी।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा, योग, वेद, ध्यान और भारतीय मूल्यों को भी शिक्षा से जोड़ने की दिशा में काम कर रहा है।
