15 दिसम्बर 2025
सीजी क्राइम रिपोर्टर…….
इसी खामोशी को संवाद में बदलने की एक संवेदनशील पहल है

“अहा ज़िंदगी – रिश्तों की पाठशाला”,
जो 14 दिसंबर 2025, रविवार को बिलासपुर लखीराम अग्रवाल ऑडिटोरियम में आयोजित की गई।
यह कार्यक्रम युवाओं से सीधा संवाद करता है—
उन युवतियों से, जो रिश्ते में सुनी जाना चाहती हैं,
और उन युवकों से, जो अक्सर मजबूत दिखने की मजबूरी में
अपनी भावनाएं कहना भूल जाते हैं।
कार्यक्रम का मूल संदेश बेहद मानवीय और गहरा है—
विवाह अधिकार नहीं, समझौता नहीं, बल्कि सहभागिता है।
जहां स्त्री की संवेदनशीलता सम्मान चाहती है
और पुरुष की जिम्मेदारी भरोसा मांगती है।
जब दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हैं,
तभी रिश्ता बोझ नहीं, सहारा बनता है।
इस संवाद मंच पर विशेषज्ञों ने यह बताया कि—
स्त्री की चुप्पी को कमजोरी न समझा जाए,
कैसे पुरुष की खामोशी को बेरुखी नहीं माना जाए,
और कैसे” मैं “से निकलकर” हम” की यात्रा शुरू की जाए।
मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह समझाया जाएगा कि
विवाह के बाद आने वाले उतार–चढ़ाव, अपेक्षाओं की टकराहट
और परिवारों के दबाव के बीच भी
एक-दूसरे का हाथ कैसे थामे रखना चाहिए
“अहा ज़िंदगी – रिश्तों की पाठशाला”
उन युवाओं के लिए है, जो प्यार को निभाना चाहते हैं,
उन माता–पिता के लिए है, जो बच्चों को खुश देखना चाहते हैं,
और उन नवविवाहितों के लिए है,
जो रिश्ते को जीत नहीं, समझ से चलाना चाहते हैं।
आयोजकों का मानना है कि
अगर आज की पीढ़ी को समय रहते
स्त्री–पुरुष संवेदनाओं की सच्ची समझ मिल जाए,
तो रिश्ते टूटने से पहले जुड़ना सीख सकते हैं।
यह आयोजन सिर्फ एक तारीख नहीं,
बल्कि एक एहसास है—
जहां सवाल यह नहीं होगा कि कौन सही है,
बल्कि यह कि रिश्ता कैसे बचे।
क्योंकि जब संवाद होता है,
तो ज़िंदगी सिर्फ जी नहीं जाती—
“अहा ज़िंदगी” बन जाती है।
बिलासपुर:–आज की युवा पीढ़ी प्रेम करना जानती है, सपने देखती है, साथ जीने की कसमें भी खाती है—
लेकिन रिश्तों को समझना सीखना अभी बाकी है।
यहीं से जन्म लेती हैं खामोशियां, शिकायतें और वो दूरी,
जो दो दिलों के बीच होते हुए भी महसूस नहीं होने देती।
