02 अगस्त 2026
सीजी क्राइम रिपोर्टर
न्यायधानी बिलासपुर
ग्राम पंचायत निरतु के मिडिल स्कूल और प्राथमिक शाला,संकुल केंद्र में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने शिक्षा व्यवस्था, पंचायत प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्कूल परिसर में बच्चों के शौचालय की छत अचानक भरभराकर गिर गई। यह महज संयोग था कि घटना के समय वहां कोई बच्चा मौजूद नहीं था। यदि उस समय बच्चे शौचालय का उपयोग कर रहे होते, तो यह घटना कई मासूमों की जान ले सकती थी और पूरा क्षेत्र एक बड़े हादसे का गवाह बन जाता।

यह घटना सिर्फ एक छत गिरने की नहीं, बल्कि जिम्मेदारों की लापरवाही की पोल खोलने वाली है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि 400 से अधिक बच्चों वाले इस मिडिल स्कूल की जर्जर छतों की मरम्मत प्राथमिकता क्यों नहीं बनी? आखिर किस सोच के तहत बच्चों की सुरक्षा को नजरअंदाज कर जमीन पर टाइल्स लगाने को अधिक जरूरी समझ लिया गया?
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि समाचार लिखे जाने तक शौचालय की टूटी हुई छत की मरम्मत तक नहीं कराई गई। ऐसा प्रतीत होता है मानो जिम्मेदार किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हों। यदि समय रहते यह मरम्मत नहीं कराई गई और भविष्य में कोई अप्रिय घटना होती है, तो उसकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?

स्कूल और पंचायत दोनों पर उठ रहे गंभीर सवाल:जानकारी के अनुसार स्कूल के विकास कार्यों के लिए राशि स्वीकृत हो चुकी है। इसके बावजूद आज तक स्कूल के जर्जर कमरों और छतों का न तो मरम्मत कार्य कराया गया और न ही उनका पुनर्निर्माण किया गया। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि बच्चों की जान से बढ़कर आखिर कौन सा विकास कार्य हो सकता है?
जब हमारी टीम ने ग्राम पंचायत निरतु का निरीक्षण किया, तो कई ऐसे तथ्य सामने आए जिन्होंने पूरे पंचायत तंत्र को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया।

इस संबंध में जब प्रधान पाठक श्रीमती बिंदा तिवारी से चर्चा की गई तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पंचायत की महिला सरपंच ने आखिर किस सोच के तहत स्कूल की छतों की मरम्मत कराने के बजाय जमीन पर टाइल्स लगवा दीं, जबकि सबसे पहले जर्जर छतों का निर्माण कराया जाना चाहिए था।
प्रधान पाठक श्रीमती बिंदा तिवारी ने यह भी बताया कि स्कूल विकास कार्यों की राशि सीधे पंचायत के खाते में आती है और पंचायत अपने स्तर पर कार्य कराती है। उन्होंने कहा कि पंचायत को स्कूल की जर्जर स्थिति की पूरी जानकारी थी, इसके बावजूद स्कूल प्रबंधन को विश्वास में लिए बिना टाइल्स लगाने का कार्य करा दिया गया, जबकि सबसे पहले बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए छतों की मरम्मत आवश्यक थी।

उन्होंने यह भी जानकारी दी कि उक्त भवन में दो पालियों में विद्यालय का संचालन होता है। प्रथम पाली में शासकीय प्राथमिक शाला निरतु संचालित होती है, जिसमें कक्षा पहली से पांचवीं तक लगभग 175 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। वहीं द्वितीय पाली प्रातः 11:30 बजे से मिडिल स्कूल संचालित होता है, जिसमें कक्षा छठवीं से आठवीं तक लगभग 320 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। अर्थात प्रतिदिन लगभग 495 बच्चों का भविष्य इसी भवन पर निर्भर है।
सबसे बड़ा सवाल—अगर किसी बच्चे की जान चली जाती तो जिम्मेदार कौन होता?
अब सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील सवाल यही है कि यदि इस हादसे में कोई बच्चा घायल हो जाता या किसी मासूम की जान चली जाती, तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होती?
क्या इसकी जवाबदेही स्कूल प्रबंधन की होती?
या फिर पंचायत की महिला सरपंच की?
या उन अधिकारियों की, जिन्होंने स्वीकृत राशि के बावजूद जर्जर भवन की सुध नहीं ली?
इन सवालों के जवाब आज भी अधूरे हैं। लेकिन इतना तय है कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी लापरवाही किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जा सकती।
यह मामला केवल एक स्कूल का नहीं, बल्कि उन सभी सरकारी व्यवस्थाओं पर सवाल है जहां विकास कार्यों की प्राथमिकताएं बच्चों की सुरक्षा से ऊपर रख दी जाती हैं।
इस पूरे मामले में कई और चौंकाने वाले खुलासे अभी बाकी हैं। देखिए इस विशेष पड़ताल का भाग-2, जिसमें सामने आएंगे पंचायत और विकास कार्यों से जुड़े कई ऐसे तथ्य, जो आपको हैरान कर देंगे।
सीजी क्राइम रिपोर्टर, प्रधान संपादक
