दो वर्ष तक भरण-पोषण न देने पर विवाह विच्छेद संभव, हाईकोर्ट का अहम निर्णय…
11 फरवरी 2026
सीजी क्राइम रिपोर्टर
न्यायधानी बिलासपुर
मुस्लिम विवाह कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पति लगातार दो वर्षों तक पत्नी का भरण-पोषण नहीं करता है, तो पत्नी को विवाह विच्छेद (तलाक) का कानूनी अधिकार प्राप्त है। अदालत ने यह भी कहा कि पत्नी का मायके में रहना इस अधिकार में किसी प्रकार की बाधा नहीं बन सकता।
क्या है मामला?
कोरिया जिले के मनेंद्रगढ़ निवासी दंपति का विवाह 30 सितंबर 2015 को मुस्लिम रीति-रिवाज से हुआ था। विवाह के कुछ समय बाद ही पारिवारिक विवाद उत्पन्न हुआ और पत्नी लगभग 15 दिन बाद मायके लौट गई। मई 2016 से वह अपने मायके में रह रही थी।
पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने उसके नाम की 10 लाख रुपये की एफडी तुड़वाने का दबाव बनाया। इसके बाद उसने घरेलू हिंसा, धारा 498-ए और भरण-पोषण से संबंधित प्रकरण दर्ज कराए। फैमिली कोर्ट ने परिस्थितियों के आधार पर तलाक का आदेश पारित किया था, जिसे चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 की धारा 2(ii) का उल्लेख करते हुए कहा कि पत्नी का पति के साथ निवास करना अनिवार्य शर्त नहीं है। यदि पति दो वर्षों तक भरण-पोषण देने में विफल रहता है, तो यह तलाक के लिए पर्याप्त आधार है।
रिकॉर्ड से यह प्रमाणित हुआ कि वर्ष 2016 से लगभग आठ वर्षों तक पति ने पत्नी के भरण-पोषण की कोई व्यवस्था नहीं की। इस आधार पर अदालत ने तलाक के आदेश को बरकरार रखा।
हालांकि, पति द्वारा पत्नी की संपत्ति हड़पने या उसके कानूनी अधिकारों में बाधा डालने के आरोपों को लेकर फैमिली कोर्ट के निष्कर्षों को हाईकोर्ट ने पलट दिया। अदालत ने कहा कि केवल एफडी तुड़वाने का आरोप संपत्ति दुरुपयोग सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक कि उसके समर्थन में ठोस साक्ष्य प्रस्तुत न किए जाएँ।
आंशिक रूप से स्वीकार हुई अपील
अदालत ने पति की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए संपत्ति संबंधी निष्कर्षों में संशोधन किया, किंतु भरण-पोषण न देने के आधार पर तलाक का आदेश कायम रखा।
इस निर्णय को मुस्लिम महिलाओं के वैधानिक अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि भरण-पोषण का अधिकार कानूनी रूप से संरक्षित है और इसकी अनदेखी स्वीकार्य नहीं होगी।
