19 अगस्त 2026
सीजी क्राइम रिपोर्टर
न्यायधानी बिलासपुर
बिलासपुर। बिल्हा विकासखंड के घुमा, शिलपहरी, हरदी और बसिया क्षेत्र में स्थित नचिकेता पावर एंड स्टील प्राइवेट लिमिटेड के प्रस्तावित क्षमता विस्तार को लेकर ग्रामीणों के सवाल लगातार तेज होते जा रहे हैं। 20 अगस्त को प्रस्तावित जनसुनवाई से पहले ग्रामीणों ने न केवल जनसुनवाई की सूचना के प्रचार-प्रसार पर सवाल उठाए हैं, बल्कि वर्षों पहले किसानों से ली गई जमीन, क्षेत्र में पर्यावरणीय प्रभाव, गिरते भूजल स्तर और
कंपनी द्वारा किए गए वृक्षारोपण के दावों को लेकर भी प्रशासन से जवाब मांगा है।
ग्रामीणों का कहना है कि किसी औद्योगिक परियोजना के विस्तार से जुड़े पर्यावरणीय निर्णय में प्रभावित लोगों को अपनी आपत्ति और सुझाव रखने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए। पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) व्यवस्था के तहत परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया निर्धारित है और जिन परियोजनाओं में जनसुनवाई लागू होती है, वहां सार्वजनिक भागीदारी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जनसुनवाई की सूचना पर सबसे बड़ा सवाल:ग्रामीणों का आरोप है कि 20 अगस्त की प्रस्तावित जनसुनवाई को लेकर क्षेत्र में अपेक्षित स्तर पर प्रचार-प्रसार नहीं किया गया। उनका कहना है कि गांवों में मुनादी नहीं कराई गई और जनसंपर्क विभाग के माध्यम से भी व्यापक समाचार प्रचार नहीं दिखा, जिसके कारण अनेक ग्रामीणों को जनसुनवाई की जानकारी समय पर नहीं मिल पाई।
ग्रामीणों का सवाल है कि यदि जनसुनवाई प्रभावित जनता की राय जानने का माध्यम है तो इसकी सूचना गांव-गांव तक पहुंचाना क्यों सुनिश्चित नहीं किया गया?
ईआईए प्रक्रिया में सार्वजनिक सूचना और जनभागीदारी का उद्देश्य ही यह है कि प्रभावित क्षेत्र के लोग परियोजना के संभावित प्रभावों पर अपनी बात रख सकें। हाल के आधिकारिक पर्यावरणीय दस्तावेजों में भी सार्वजनिक घोषणाओं और समाचारपत्रों के माध्यम से सूचना दिए जाने के उदाहरण मिलते हैं।
10-15 साल पहले ली गई जमीन पर अब क्यों परियोजना?:ग्रामीणों ने एक और अहम सवाल उठाते हुए कहा कि किसानों से लगभग 10 से 15 वर्ष पहले जमीन लिए जाने के बाद अब उस जमीन पर प्लांट अथवा क्षमता विस्तार की प्रक्रिया क्यों आगे बढ़ाई जा रही है?
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि जमीन अधिग्रहण/खरीदी की पूरी प्रक्रिया, उस समय किए गए आश्वासन, जमीन के वर्तमान उपयोग और प्रस्तावित परियोजना के बीच संबंध को सार्वजनिक किया जाए। उनका कहना है कि जिन किसानों की जमीन परियोजना के लिए ली गई थी, उनके हितों और उस समय निर्धारित शर्तों की भी समीक्षा होनी चाहिए।
गांवों के पर्यावरण पर असर का दावा:ग्रामीणों का आरोप है कि संयंत्र के आसपास के गांवों में धूल, धुआं, शोर और औद्योगिक गतिविधियों के कारण पर्यावरणीय स्थिति को लेकर लगातार चिंता बनी हुई है। उनका कहना है कि क्षमता विस्तार के बाद उत्पादन और परिवहन बढ़ने पर इसका प्रभाव और बढ़ सकता है।
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत पर्यावरणीय प्रदूषकों के उत्सर्जन और निर्वहन के लिए निर्धारित मानकों का पालन आवश्यक है। अधिनियम में वायु, जल, मृदा और अन्य पर्यावरणीय मानकों तथा प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित प्रावधानों के लिए सरकार को अधिकार दिए गए हैं।
ग्रामीणों की मांग है कि क्षमता विस्तार से पहले स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक आधार पर वायु, जल, मिट्टी और शोर की जांच कराई जाए तथा उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
वृक्षारोपण पर भी ग्रामीणों ने मांगा हिसाब:ग्रामीणों ने कंपनी के पर्यावरणीय दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि अब तक क्षेत्र में कंपनी की ओर से कितने वृक्ष लगाए गए, इसका स्पष्ट विवरण सामने आना चाहिए।
ग्रामीणों का आरोप है कि आज तक कंपनी द्वारा पर्याप्त स्तर पर वृक्षारोपण नहीं कराया गया, जबकि औद्योगिक गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए हरित क्षेत्र और वृक्षारोपण महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
ग्रामीणों ने मांग की है कि कंपनी द्वारा पिछले वर्षों में किए गए वृक्षारोपण का स्थान, संख्या, प्रजाति, जीवित पौधों की संख्या और रखरखाव का विवरण सार्वजनिक किया जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि पर्यावरण प्रबंधन योजना में हरित पट्टी और वृक्षारोपण को लेकर क्या लक्ष्य निर्धारित हैं।
शिलपहरी-घुमा में गिरते जलस्तर पर चिंता:ग्रामीणों ने शिलपहरी और घुमा क्षेत्र में भूजल स्तर नीचे जाने का दावा करते हुए औद्योगिक इकाई के लिए जल उपयोग पर भी सवाल उठाए हैं।
उनका कहना है कि यदि क्षेत्र में पहले से ही जलस्तर प्रभावित हो रहा है तो क्षमता विस्तार के बाद बढ़ने वाली औद्योगिक गतिविधियों के लिए अतिरिक्त जल की आवश्यकता का स्थानीय जलस्रोतों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए।
ग्रामीणों ने मांग की है कि क्षेत्र के बोरवेल, कुओं और अन्य जलस्रोतों के जलस्तर का पूर्व और वर्तमान आंकड़ों के आधार पर अध्ययन कराया जाए तथा कंपनी के जल उपयोग और जल-स्रोतों पर उसके संभावित प्रभाव की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
खेती और फसलों को लेकर किसानों की चिंता:ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार खेती है। ऐसे में धूल, औद्योगिक उत्सर्जन अथवा जलस्रोतों की गुणवत्ता में किसी भी प्रकार का बदलाव किसानों के लिए गंभीर विषय हो सकता है।
किसानों ने फसल, मिट्टी और सिंचाई के पानी की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि क्षमता विस्तार पर निर्णय लेने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्रस्तावित परियोजना का कृषि भूमि और स्थानीय जलस्रोतों पर संभावित प्रभाव कितना होगा।
स्कूल और आबादी वाले क्षेत्रों को लेकर भी सवाल
ग्रामीणों ने क्षेत्र के स्कूलों और आबादी वाले इलाकों के आसपास वायु गुणवत्ता एवं शोर के स्तर की जांच की मांग की है। उनका कहना है कि औद्योगिक गतिविधियों के बढ़ने के साथ वाहनों की आवाजाही, धूल और शोर बढ़ने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ग्रामीणों की मांग है कि स्कूलों और आबादी वाले क्षेत्रों के आसपास नियमित पर्यावरणीय निगरानी के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं।
कानून के तहत पारदर्शिता की मांग:ग्रामीणों का कहना है कि पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया केवल कागजी औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। EIA Notification, 2006 के तहत लागू प्रक्रिया में परियोजना से संबंधित पर्यावरणीय प्रभावों और सार्वजनिक भागीदारी को महत्व दिया जाता है। आधिकारिक पर्यावरणीय दस्तावेजों में जनसुनवाई से पहले समाचारपत्रों में सूचना और गांवों में सार्वजनिक घोषणा किए जाने के उदाहरण भी दर्ज हैं।
इसी आधार पर ग्रामीणों ने मांग की है कि 20 अगस्त की जनसुनवाई से पहले सूचना के प्रचार-प्रसार, प्रभावित गांवों की वास्तविक भागीदारी, EIA/EMP दस्तावेजों की उपलब्धता और ग्रामीणों की आपत्तियों को रिकॉर्ड में लेने की प्रक्रिया स्पष्ट की जाए।
ग्रामीणों ने रखी ये प्रमुख मांगें:ग्रामीणों ने प्रशासन और संबंधित पर्यावरणीय अधिकारियों से मांग की है कि—
20 अगस्त की जनसुनवाई की सूचना का प्रभावित गांवों में व्यापक प्रचार-प्रसार कराया जाए।
जनसुनवाई की सूचना के संबंध में मुनादी और अन्य सार्वजनिक सूचना माध्यमों की स्थिति स्पष्ट की जाए।
किसानों से 10-15 वर्ष पहले ली गई जमीन से संबंधित दस्तावेज और परियोजना की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक की जाए।
शिलपहरी, घुमा और आसपास के गांवों में भूजल स्तर की वैज्ञानिक जांच कराई जाए।
कंपनी के जल उपयोग और भूजल पर संभावित प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जाए।
वायु, जल, मिट्टी और शोर की स्वतंत्र जांच कराकर रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
कंपनी द्वारा अब तक किए गए वृक्षारोपण की संख्या और वर्तमान स्थिति का सत्यापन कराया जाए।
स्कूलों और आबादी वाले क्षेत्रों के आसपास पर्यावरणीय निगरानी की जाए।
क्षमता विस्तार से पहले वर्तमान पर्यावरणीय स्थिति और पूर्व शिकायतों की निष्पक्ष समीक्षा की जाए।
“विकास चाहिए, लेकिन पर्यावरण और किसानों की कीमत पर नहीं”:ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर खेती, जलस्रोत, पर्यावरण और ग्रामीण जीवन प्रभावित नहीं होना चाहिए। उनका कहना है कि पहले मौजूदा स्थिति की वैज्ञानिक जांच और ग्रामीणों की आपत्तियों का निष्पक्ष परीक्षण होना चाहिए, उसके बाद ही क्षमता विस्तार पर आगे की प्रक्रिया बढ़ाई जाए।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया अथवा जनसुनवाई में पर्याप्त पारदर्शिता नहीं बरती गई तो वे लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध दर्ज कराएंगे।
