21 जून 2026
सीजी क्राइम रिपोर्टर
न्यायधानी बिलासपुर
बिलासपुर। एक ओर भीषण गर्मी लोगों का जीना मुश्किल कर रही है। घरों में कूलर और एसी भी राहत देने में नाकाम साबित हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बिलासपुर नगर निगम क्षेत्र के वार्ड क्रमांक 52 लिंगियाडीह के सैकड़ों गरीब, मजदूर और मेहनतकश परिवार पिछले 209 दिनों से खुले आसमान के नीचे तपती धूप में बैठकर अपने आशियाने को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि अपने घर, अपने अधिकार और अपने अस्तित्व को बचाने का संघर्ष बन चुका है। हर दिन आंदोलन स्थल पर पहुंचने वाले बुजुर्ग, महिलाएं और युवा एक ही सवाल पूछ रहे हैं—क्या विकास के नाम पर गरीबों का घर उजाड़ देना ही व्यवस्था का न्याय है?

आंदोलनकारियों का आरोप है कि वर्षों पुरानी बस्ती को हटाकर वहां मॉल और व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स विकसित करने की तैयारी की जा रही है। इसी आशंका के चलते क्षेत्र के लोग लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन विकास की कीमत गरीबों की छत छीनकर नहीं चुकाई जा सकती।

सबसे पीड़ादायक बात यह है कि 209 दिनों से चल रहे इस आंदोलन के बावजूद न तो प्रशासन ने कोई ठोस समाधान प्रस्तुत किया है और न ही शासन की ओर से कोई स्पष्ट आश्वासन दिया गया है। बार-बार ज्ञापन, आवेदन और जनप्रतिनिधियों के माध्यम से मांग उठाने के बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई है।

वार्ड क्रमांक 52 के पार्षद दिलीप पाटिल भी आंदोलनकारियों के साथ मजबूती से खड़े नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि बस्तीवासियों की मांगों को लेकर कई बार नगर निगम और शासन-प्रशासन को अवगत कराया गया है, लेकिन अब तक केवल आश्वासन ही मिले हैं, समाधान नहीं।
आंदोलनकारियों का कहना है कि यदि सरकार और प्रशासन वास्तव में जनहित की बात करते हैं, तो उन्हें पहले उन गरीब परिवारों के भविष्य की चिंता करनी चाहिए, जिन्होंने वर्षों की मेहनत से अपना आशियाना बसाया है। उनका सवाल है कि आखिर गरीबों के सिर से छत छीनकर किस तरह का विकास किया जाएगा?
लिंगियाडीह की धरती पर चल रहा यह संघर्ष अब केवल एक बस्ती का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह गरीबों के आवासीय अधिकार, सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदनाओं की परीक्षा बन चुका है।
बस्तीवासियों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि जब तक उनके अधिकारों की सुरक्षा, पुनर्वास और स्थायी समाधान को लेकर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।
अब निगाहें शासन और प्रशासन पर टिकी हैं। सवाल यह है कि 209 दिनों से धूप, बारिश और मुश्किलों के बीच न्याय की आस लगाए बैठे इन लोगों की पुकार आखिर कब सुनी जाएगी?
