06 जनवरी 2026
सीजी क्राइम रिपोर्टर……
बिलासपुर/मुंगेली
छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिजर्व (ATR) में वन्यजीव संरक्षण और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रतिबंधित कोर जोन से लगे क्षेत्र में अवैध प्रवेश, खुलेआम हथियार लहराने और फायरिंग का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद ही वन विभाग और पुलिस हरकत में आई। हालांकि तीन आरोपियों की गिरफ्तारी कर ली गई, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित है—आखिर हथियारों के साथ रिजर्व की दहलीज तक पहुंचना इतना आसान कैसे हो गया?
वन विभाग ने वायरल वीडियो का संज्ञान लेते हुए पुलिस के साथ संयुक्त कार्रवाई कर अजीत वैष्णव (26), अनिकेत (27) और विक्रांत वैष्णव (36) को गिरफ्तार किया। आरोपियों के पास से दो एयर राइफल और एक टाटा सफारी स्टॉर्म वाहन जब्त किया गया। तीनों के खिलाफ वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत मामला दर्ज कर न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया।

गिरफ्तारी से ज्यादा गंभीर सवाल:–
कार्रवाई के बाद मामला खत्म मान लिया जाए, लेकिन असल चिंता गिरफ्तारी नहीं, बल्कि सिस्टम की खामियां हैं। विशेषज्ञों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि इतना संवेदनशील टाइगर रिजर्व, जहां बाघों की संख्या पहले से ही चिंता का विषय बनी हुई है, वहां हथियारों के साथ घुसपैठ होना सीधे तौर पर सुरक्षा तंत्र की विफलता को दर्शाता है।
सवाल उठ रहे हैं कि क्या बिना किसी विभागीय लापरवाही या मौन सहमति के कोर जोन से सटे इलाके तक पहुंच संभव है? अगर बैरियर पार किया गया, हथियार लहराए गए और गोलीबारी तक हुई, तो मौके पर तैनात अमला क्या कर रहा था?
कागजों में कार्रवाई, जमीनी जवाबदेही नदारद:–
विभागीय स्तर पर एक बैरियर गार्ड को तत्काल हटाया गया और संबंधित परिक्षेत्र अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। जांच के लिए सहायक संचालक (कोर) को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि जिस व्यवस्था की विफलता से यह घटना घटी, वही व्यवस्था खुद अपनी जांच कर रही है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठना लाजमी है।

संरक्षण व्यवस्था पर सीधा हमला?
वन विभाग भले ही दावा कर रहा हो कि अवैध गतिविधियों और वन्यप्राणियों को नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी कृत्य को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि हथियारबंद घुसपैठ केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि पूरे संरक्षण तंत्र पर सीधा हमला है।
मौन क्यों, निगरानी कहां थी?
इस पूरे प्रकरण में यह सवाल भी उठ रहा है कि वीडियो वायरल होने से पहले निगरानी तंत्र कहां था? क्या कार्रवाई सिर्फ तब ही होती है, जब मामला सार्वजनिक दबाव में आता है? और सबसे अहम—क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कभी वास्तविक जवाबदेही तय होगी?
वन विभाग ने आम नागरिकों से अवैध गतिविधियों की सूचना देने की अपील की है, ताकि जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। लेकिन यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि
क्या सिस्टम सच में जंगल की रखवाली कर रहा है, या जंगल सिस्टम की लापरवाही का शिकार बनता जा रहा
